Thursday, October 16, 2008

मुक्तक 3

जीवन का मधुर गीत सुनाती हूँ तुम्हें
सोए हो तो सोते से जगाती हूँ तुम्हें
जो ढूँढने निकलेगा सो पाएगा वही
इक बात पते की यह बताती हूँ तुम्हें

क्यों बात कोई मनकी सुनाने आए
क्यों घाव कोई अप्ने दिखाने आए
क्यों आप ही हम हाल न पूछें उसका
क्यों हमको कोई हाल अपना बताने आए

पत्थर का जरूरी नहीं कोमल होना
दरिया के लिए शुभ नहीं दलदल होना
निर्माण भी बल में है, तो फल भी बल में
दुनिया में महापाप है निर्बल होना

मानव का क्ल्याण मुहब्बत होगी
क्या इससे अधिक कोई राहत होगी
क्या मन से बड़ा है कोई सागर जग में
क्या ज्ञान से बढ़कर कोई दौलत होगी

डॉ. मीना अग्रवाल

1 comment:

Dr. Meena Agarwal said...
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