Tuesday, October 28, 2008

मुक्तक 15

पारा मुहब्बतों का उतरने नहीं दिया
यादों के कारवाँ को गुज़रने नहीं दिया
घर-घर के बीच बुनती रहीं चाहतों के जाल
नारी ने यह समाज बिखरने नहीं दिया

जीने के रंग-ढंग बताता नहीं कोई
बाहर से चेतना को जगाता नहीं कोई
वे खुद ही सीख लेती हैं पढ़ना निगाह का
यह ज्ञान लड़कियों को सिखाता नहीं कोई

ममता की भावना से हैं बाँहें खुली हुईं
सब दर खुले हैं, सारी दिशाएँ खुली हुईं
नारी को बेख़बर न समझना कि उसके हैं
हर अंग में शरीर के आँखें लगी हुईं

सौ बार टूट-टूट के साबित रही हूँ मैं
पीड़ाएँ झेल-झेल के हर्षित रही हूँ मैं
हाथों से अपने जिसको सँवारा, युवा किया
पुरुषों के उस समाज में शोषित रही हूँ मैं

डॉ. मीना अग्रवाल

4 comments:

Udan Tashtari said...

पारा मुहब्बतों का उतरने नहीं दिया
यादों के कारवाँ को गुज़रने नहीं दिया
घर-घर के बीच बुनती रहीं चाहतों के जाल
नारी ने यह समाज बिखरने नहीं दिया


-ये बढ़िया हैं. आखिरी वाले में तो आपने पूरे पुरुष समाज को एक ही तराजू में तौल दिया. ऐसी भी क्या नाराजगी?

सादर

समीर लाल

नारदमुनि said...

janha seeta bhee sukh pa naa saki, tu us dharti kee nari hai, jo julm teri takdeer me hai wo julm yugon se jaari hai.

baat karunga prabhu se

narayan narayan

श्यामल सुमन said...

यादों के कारवाँ को गुजरने से न रोकिये।
यादों के सहारे ही तो चलती है जिन्दगी।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

apurn said...

achhi lagi ye kavita