Tuesday, December 9, 2008

मुक्तक 31

अजीब बात है पहले पहल की चाहत में
तुम्हारे झूठ भी सच की तरह-से लगते थे
मैं अब अकेले में यह सोच-सोच हँसती हूँ
तुम्हारे पास लुभाने को कितने सपने थे

मेरे ध्यान के एलबम में चित्र हैं तेरे
बुझी नहीं है तेरी दीपिका जलाई हुई
नयन से दूर है, मन के करीब लगती है
पराई होके भी बेटी कहाँ पराई हुई

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, December 1, 2008

मुक्तक 30

हमको दुनिया का अंदाज़ भाया नहीं
पथ बदलना कभी हमको आया नहीं
जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं

कहते-सुनते ही नीरस कहानी हुई
धुँधली-धुँधली-सी हर इक निशानी हुई
लाख सोचा सुहागिन ने, समझी नहीं
साल में क्यों ये संगत पुरानी हुई

डॉ. मीना अग्र्वाल

Sunday, November 23, 2008

मुक्तक 29

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं
तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं
कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में,
तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं!

हमने सपनों की दुनिया सजाए रखी
शम्अ आँधी में हमने जलाए रखी
सबके सिर से दुपट्टे सरकते रहे
लाज आँचल की हमने बचाए रखी !

डॉ. मीना अग्रवाल

Tuesday, November 18, 2008

मुक्तक 28

मैं कि हूँ उसके भीतर से परिचित बहुत
जानती हूँ तो कहती हूँ विश्वास से
उसकी आँखों में होगा कोई और भी
जब वह जाएगा उठकर मेरे पास से !

क्या ये पहलू समर्पण न कहलाएगा
क्या कोई इसका मतलब समझ पाएगा
हम बनाएँगी औ' सोचती जाएँगी
क्या यह पकवान उनको पसंद आएगा !

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, November 17, 2008

मुक्तक 27

हमको अपने बराबर न तोला कभी
यह पुराना तरीक़ा न बदला कभी
दिल की धड़कन से गीतों की धुन फूटती
पति शासक नहीं, मित्र बनता कभी

अपने भेदों की गुत्थी न खोलेगे तुम
बस अँधेरे में रस्ता टटोलोगे तुम
घर में फिर लौटकर देर से आओगे
जानती हूँ कि फिर झूठ बोलोगे तुम

डॉ. मीना अग्रवाल

Tuesday, November 11, 2008

मुक्तक 26

हमको अपने बराबर न तोला कभी
यह पुराना तरीक़ा न बदला कभी
दिल की धड़कन से गीतों की धुन फूटती
पति शासक नहीं, मित्र बनता कभी

अपने भेदों की गुत्थी न खोलोगे तुम
बस अँधेरे में रस्ता टटोलोगे तुम
घर में फिर लौटकर देर से आओगे
जानती हूँ कि फिर झूठ बोलेगे तुम

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, November 10, 2008

मुक्तक 25

जाने नदिया यह सपनों की जम क्यों गई
जाने मुसकान होठों पे थम क्यों गई
जन्म बेटी का होना अशुभ क्यों हुआ
किससे पूछूँ कि माता सहम क्यों गई !

ध्यान में है वो नादान लड़की अभी
झूठे वादे जो मन से लगाए रही
लौटकर फिर कभी जिसको आना न था
उसके स्वागत में पलकें बिछाए रही !

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, November 9, 2008

मुक्तक 24

सोच को दायरा कुछ नया और दे
इस अँधेरे को मन का दिया और दे
धन के लोभी से यह बात पूछे कोई
दान दी जिसने बेटी वो क्या और दे !

बालिका धन पराया ही समझी गई
जग मॆं सदियों से यह रीत देखी गई
आँसुओं से उमंगें गले मिल गईं
छोड़ बाबुल का घर जब भी बेटी गई

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, November 7, 2008

मुक्तक 23

हम डगर अपनी छोडें, यह संभव नहीं
आत्मा अपनी बदलें, यह संभव नहीं
फ़ैशनों की नुमाइश में रहते हुए
मूल से अपने बिछुड़ें यह संभव नहीं

मेरे सपनों का आदर्श मानव है
सोच यह मेरी बदले असंभव है
मेरी पहचान दुनिया में सबसे अलग
मैं हूँ भारत की नारी , मुझे गर्व है

ताज़ा फूलों के अंबार भेजूँ तुम्हें
बस अगर हो तो सौ बार भेजूँ तुम्हें
नित नई ख़ुशबुओं को जो आकार दे
सुर्ख मेंहदी की महकार भेजूँ तुम्हें

आदमी से बड़ा धन न बन पाएगा
सोचते थे समय तो बदल जाएगा
हम रहेंगे सफ़र में सदा साथ-साथ
प्यार बाँटेंगे, अपनत्व भी आएगा !

डॉ. मीना अग्रवाल

Thursday, November 6, 2008

मुक्तक 22

जो चमक है सो है धन के अंबार की
किसको चिंता है अब अपने उद्धार की
लड़कियाँ किसलिए बोझ बनने लगीं
क्यों ये दूल्हे हुए वस्तु बाज़ार की

तुमसे कोमल यह रेशम की चादर नहीं
तुमसे बढ़कर तो गहरा समंदर नहीं
यों तो पत्नी भी, बेटी भी, बहनें भी हैं
माँ से बढ़कर कोई रूप सुंदर नहीं

वर की मंडी में लगती रहीं बोलियाँ
कोई दो लाख का, कोई नौ लाख का
क्या कहूँ, जल के वो किसलिए मर गई
कल जो गुड़िया-सी थी, ढेर है राख का

कुछ तो दुनिया का नक़्शा नया चाहिए
कुछ तो माहौल बदला हुआ चाहिए
मुझको चाहत है जीवन में हमदर्द की
उसको साथी नहीं, सेविका चाहिए

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, November 5, 2008

पहचान

अंदर-अंदर टूटन
अंतर में घुटन
और मुख पर मुस्कान
खुशियाँ लुटाना
आदत-सी बन गई है उसकी
इसी आशा में
इसी प्रत्याशा में
कि शायद
वो एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा
जो नारी को
उसके अस्तित्व की
पहचान कराएगा
आदर दिलाएगा
उसके अंतर की पीड़ा से
तिलमिलाएगा समाज
और तथाकथित समाज के
योग्य और सहृदय जन
महसूस करेंगे
उसकी छटपटाहट को
देंगे नारी को
उसकी पहचान
देंगे उसे सम्मान
और जीने का अधिकार
क्योंकि नारी
टूटकर भी
सदैव रही है संपूर्ण
पक्का भरोसा है उसे कि
एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा
जब खोया हुआ अतीत
होगा उजागर
इंतज़ार है उसे
उस दिन का
जो उसे न्याय दिलाएगा
देखते हैं कब आएगा
वह भाग्यशाली एक दिन !

डॉ. मीना अग्रवाल

Tuesday, November 4, 2008

मैं और तुम

मैं, मैं हूँ
और तुम, तुम हो
तुम्हारा मन
बँधा है तुमसे
और मेरा मन तो
बँधा है सबसे
तुम गुनगुनाते हो
तो सुनती हूँ
केवल मैं
पर मेरी
आवाज़ के घुँघरू
जब बज उठते हैं
अनायास
उनकी रुनझुन
सुनाई देती है
दूर,बहुत दूर
अंतर में
मन पाता है सहारा
और तन को
मिलता है विश्वास
उस ध्वनि में
छिपा है जीवन का
मधुरिम मधुमास
पर नहीं सुनाई देती
किसी को वह ध्वनि
क्योंकि सभी ने
ओढ़ लिया है
कृत्रिमता का लिबास !

Monday, November 3, 2008

मुक्तक 21

सामने यों तो सारी दुनिया है
जानती हूँ मैं कि कौन अपना है
यों तो सब कुछ है मेरे पास मगर
तुमसे माँगूँ तो सुख-सा मिलता है

सोचती हूँ शरद के ये पंछी
रुत गुज़रते ही लौट जाएँगे
लाख आकर सजाएँगे झीलें
देस अपने भुला न पाएँगे

छत के ऊपर विमान गुज़रा है
कल्पनाएँ निहारतीं हैं तुझे
अजनबी लोग इसमें हैं लेकिन
मेरी आँखें पुकारती हैं तुझे

दर्द हुंकार बन न जाए कहीं
चीख तलवार बन न जाए कहीं
मुझको इतना न तोड़ना, देखो
गीत ललकार बन न जाए कहीं

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, November 2, 2008

मुक्तक 20

आस के गुल खिलाए रखते हैं
चित्र मन में सजाए रखते हैं
अपनी बस्ती से दूर जाकर भी
लोग रिश्ते बनाए रखते हैं

गाँव मेरे बिना बसा ही नहीं
प्यार मुझसे अलग हुआ ही नहीं
मुझको कहते हैं घर की लक्ष्मी
बिन मेरे घर की कल्पना ही नहीं

तेज कितना छिपा है यौवन में
दीप-से जल गए हैं जीवन में
दुल्हनों-बेटियों से शोभा है
फूल यों तो बहुत हैं उपवन में

एक पल को न चैन से बैठी
हो गई शाम घर सजाने में
तुम जो आए तो यह हुआ आभास
कुछ कमी रह गई अजाने में

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, October 31, 2008

मुक्तक 19

सबकी सीमाएँ अपनी-अपनी हैं
फूल की जड़ में शूल होता है
प्रेम भी तो बगैर धर्म नहीं
जंग का भी उसूल होता है

मैं हूँ नारी तो देखिए मुझको
ओस छिड़के हुए गुलाब मिले
चाहे मुस्कान हो कि आँसू हों
जब मिले मुझको बेहिसाब मिले

दूर पश्चिम में तुम जहाँ भी हो
दिल की धड़कन लहर-लहर भेजूँ
क्या वो उड़कर हवा में पहुँचेगी
बास बेले की मैं अगर भेजूँ

कहानी नहीं है खिलौना नहीं है
यह नारी हक़ीक़त में अबला नहीं है
सजाना नहीं घर उसे तोड़कर तुम
कि यह फूलदानों की शोभा नहीं है

डॉ. मीना अग्रवाल

मुक्तक 18

शांत होती हुई-सी प्यास मिली
रुत बहारों की आस-पास मिली
मिट गया ज़िंदगी का कड़वापन
उसकी बातों में वह मिठास मिली

ज़िंदगी से मुझे मुहब्बत है
चाहे जाने में मुझको राहत है
तुम ज़रूरत को प्यार कहते हो
प्यार लेकिन मेरी ज़रूरत है

रीत भी है, चलन भी है इसमें
शुद्ध मन का सुमन भी है इसमें
सिर्फ़ धागा नहीं है ' राखी ' में
लाड़ भी है, वचन भी है इसमें

आप परदेस से नहीं लौटे
पाई हमने विजय अँधेरों पर
फिर से दीपावलि का पर्व आया
दीप जलने लगे मुँडेरों पर

डॉ. मीना अग्रवाल

Thursday, October 30, 2008

मुक्तक 17

यों तो गिनती में मेरे बेटे को
मुझसे बिछुड़े ये तीसरा दिन है
मैं जो माँ हूँ तो ऐसा लगता है
जैसे हर दिन पहाड़-सा दिन है

सर से आँचल ढलक गया है मेरा
माँ अगर देखती तो क्या कहती
खा के मुझसे न बोलने की क़सम
रूठ जाती, बुरा-भला कहती

भाइयों ने भुला दिया है मुझे ?
मैं परेशान होने लगती हूँ
जब भी आती है मायके की याद
घर में छिप-छिप के रोने लगती हूँ

घटा बंजरों को भिगोती है देखो
समुंदर की सीपी में मोती है देखो
निराश इतनी होकर न बैठो सहेली
विकलता में आशा भी होती है देखो

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, October 29, 2008

मुक्तक 16

बिन काम किए हाथ न अपना पोंछें
बेकार न रूमाल से चेहरा पोंछें
है बीच में विराम महापाप हमें
हम काम से निपटें तो पसीना पोंछें

जग को सँवारने की शपथ ले रही हैं हम
नौका तुम्हारी ज्वार में भी खे रही हैं हम
एहसान क्या चुकाओगे, हम नारियों का तुम
सेना को वीर, रण को लहू दे रही हैं हम

अनजान रास्तों से गुज़रने की सोचते
घर छोड़ने से पहले सँवरने की सोचते
उँगली पकड़ के हम न चलातीं तो आज तुम
क्या नभ की घाटियों में उतरने की सोचते

जीवन की कालिमा का सवेरा कहो हमें
अँगनाइयों में घर का उजाला कहो हमें
गाड़ी में संतुलन न रहे, हम अगर न हों
जीवन के रथ का दूसरा पहिया कहो हमें

डॉ. मीना अग्रवाल

Tuesday, October 28, 2008

मुक्तक 15

पारा मुहब्बतों का उतरने नहीं दिया
यादों के कारवाँ को गुज़रने नहीं दिया
घर-घर के बीच बुनती रहीं चाहतों के जाल
नारी ने यह समाज बिखरने नहीं दिया

जीने के रंग-ढंग बताता नहीं कोई
बाहर से चेतना को जगाता नहीं कोई
वे खुद ही सीख लेती हैं पढ़ना निगाह का
यह ज्ञान लड़कियों को सिखाता नहीं कोई

ममता की भावना से हैं बाँहें खुली हुईं
सब दर खुले हैं, सारी दिशाएँ खुली हुईं
नारी को बेख़बर न समझना कि उसके हैं
हर अंग में शरीर के आँखें लगी हुईं

सौ बार टूट-टूट के साबित रही हूँ मैं
पीड़ाएँ झेल-झेल के हर्षित रही हूँ मैं
हाथों से अपने जिसको सँवारा, युवा किया
पुरुषों के उस समाज में शोषित रही हूँ मैं

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, October 27, 2008

मुक्तक 14

अगर धड़कन हो दिल में दिल कभी पत्थर नहीं होता
हमारे दम से घर-आँगन कभी बंजर नहीं होता
हमें बचपन सिखाता है घरौंदे कैसे बनते हैं
अगर नारी नहीं होती तो बहनो , घर नहीं होता

सिर अपना धुन रहे थे , पता ही नहीं चला
कुछ स्वप्न बुन रहे थे , पता ही नहीं चला
एकांत में वो गाने लगी थी मिलन के गीत
तुम छिप के सुन रहे थे , पता ही नहीं चला

सोई हुई थी मैं कि उठा ले गया मुझे
झोंका था एक पल का बहा ले गया मुझे
भाई जो तुमने कहके पुकारा तो यों लगा
अनजान-सा दुलार बहा ले गया मुझे

अपनत्व की सुगंध सभी दामनों में है
कैसी अजीब दोस्ती हम-साइयों में है
रूठें कभी तो उसमें भी मन जाने की अदा
कैसा अजब ये प्यार यहाँ भाइयों में है

डॉ। मीना अग्रवाल

Sunday, October 26, 2008

मुक्तक 13

चाहत बहन को कैसी यह भाई के साथ है
कैसा लगाव सारी हवेली के साथ है
बेटी नहीं है घर में तो रौनक कहाँ से हो
आँगन की जो बहार है बेटी के साथ है

चौखट पे जो दिया है, वो नारी की देन है
जो फूल खिल रहा है, वो नारी की देन है
नारी ने बचपने में घरौंदे बनाए हैं
घर की जो कल्पना है, वो नारी की देन है

बे-ओर छोर लाज की चादर भी देखिए
मुट्ठी में बंद है जो समंदर भी देखिए
जो मन की भावना है, उसे भी तो जाँचिए
हमको हमारे रूप से बाहर भी देखिए

आहट पे डाकिए की झपटकर मैं जाऊँगी
आएँगी जब घटाएँ तो आँसू बहाऊँगी
अगले बरस वो आएँगे, कह तो गए थे,
पर मैं इक बरस पहाड़-सा कैसे बिताऊँगी


डॉ. मीना अग्रवाल

Saturday, October 25, 2008

मुक्तक 12

नीदों में आके नित नए सपने दिखाएगा
इस रात वो न आएगा, सपना तो आएगा
पहले की तरह अब नहीं आती हैं हिचकियाँ
वो मुझको याद करके समय क्यों गँवाएगा

गुज़री थी बचपने में जहाँ खेलते हुए
वर्षों रही है मन में उसी रास्ते की याद
अब मैं हूँ और साथ ही दो कश्तियों में पाँव
ससुराल का खयाल तो कभी मायके की याद

दिल के लिए वो लेके दिलासे भी आए हैं
नींद आई है तो साथ में सपने भी आए हैं
दो दिल मिले तो साथ में परिवार भी मिले
घर में बहू जो आई तो रिश्ते भी आए हैं

बेटी से मिला चैन कभी माओं से पूछिए
क्या सुख है डालियों का, परिंदों से पूछिए
परदेस जब गया है तो आँखें हुई गुलाल
भाई की चाहतें कभी बहनों से पूछिए

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, October 24, 2008

मुक्तक 11

गहनता को कब मेरी पाया है किसने
मेरे सच को दरपन दिखाया है किसने
मैं ' माँ ' हूँ मुझे कोई इतना बताए
मेरे दूध का ऋण चुकाया है किसने

ये आशाएँ मुझसे हैं, अरमान मुझसे
जगत में है जीवन का वरदान मुझसे
न होती तो उसको भी उपमा न मिलती
गगन पर है चंदा की पहचान मुझसे

मेरे हर क़दम से है राहत तुम्हारी
मेरे हाथ गढ़ते हैं किस्मत तुम्हारी
मुझे रूप में माँ के देखो तो समझो
मेरे पाँव नीचे है जन्नत तुम्हारी

ये सब चाँद-तारे हमारे लिए हैं
ये सब गीत-गाने हमारे लिए हैं
न हों हम तो ये फूल-कलियाँ निरर्थक
ये बेले के गजरे हमारे लिए हैं

डॉ. मीना अग्रवाल

Thursday, October 23, 2008

मुक्तक 10

बहन हो कि बेटी, बहू हो कि माता
ये रिश्ते हमीं से जनम ले रहे हैं
जो बन्धन निरर्थक-से लगने लगे हैं
हम उनकी अभी तक क़सम ले रहे हैं

न पूछो कि नारी को क्या-क्या न आया
विरह में समय का बिताना न आया
अभी सिर्फ़ पहला पहर रात का है
बढ़ी माँ की चिंता कि बेटा न आया

मैं नारी हूँ, है त्याग पहचान मेरी
मेरा धर्म सेवा है, सेवा रहेगा
इसी से मुझे बल मिला , यश मिला है
ज़माने में क़द मेरा ऊँचा रहेगा

सदाचार-संकल्प संगम है मेरा
मुहब्बत का व्यवहार मरहम है मेरा
मैं रेशम-सी नाजुक हूँ, चट्टान भी हूँ
समय पर यह आँचल ही परचम है मेरा

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, October 22, 2008

मुक्तक 9

वो इक धान की पौध थी नन्ही मुन्नी
जिसे बेटी कहकर पुकारा था मैंने
उसे और ही खेत में रोप आई
जिसे अंकुरित कर दुलारा था मैंने

विदाई भी राहत-सी लगने लगी है
समय की ज़रूरत-सी लगने लगी है
युवा होते-होते यह बाँहों की बच्ची
किसी की अमानत-सी लगने लगी है

ख़ज़ाने खनकते हुए क़हक़हों के
लिफ़ाफ़े पुरानी लिखी चिट्ठियों के
ये शीशे के महलों मेंसोई हुई हैं
कभी स्वप्न पूछो न तुम लड़कियों के

वो सुख घर का देखे, न सामान देखे
जो है मन के अंदर वो अरमान देखे
कभी जिसने जीवन में झाँका नहीं है
परखकर वो नारी का बलिदान देखे

डॉ। मीना अग्रवाल

Tuesday, October 21, 2008

मुक्तक 8

पहेली हूँ मुझे सुलझा के देखो
नजदीक से अब आ के देखो
समर्पण में मुझे सीता के पाओ
मुझे हर रूप में दुर्गा के देखो

मुझे इसका गिला कब तक रहेगा
कोई किस दिन मुझे चिट्ठी लिखेगा
जो सुख था प्यार की उन चिट्ठियों में
मज़ा वो दूर-भाषी सुख न देगा

चिराग़ों की चमक खोने लगी है
थकी-हारी गली सोने लगी है
यह किसकी याद ने मुझको छुआ है
बदन में गुदगुदी होने लगी है

यह कैसी ग़ज़ब की जुदाई हुई
रुकी है हँसी लब पे आई हुई
खुशी माँ की सच है तो आँसू भी सच
कि पलभर में बेटी पराई हुई

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, October 20, 2008

मुक्तक 7

ये नन्ही लड़कियाँ भी क्या अजब हैं
उमीदों का नगर बसने लगा है
सँभाला है अभी तो होश, लेकिन
अभी से मन में घर बसने लगा है

वो पर्दे पर जगह पाएगा शायद
झलक अपनी दिखा जाएगा शायद
वो इस इच्छा से टी.वी. देखती है
नज़र वो भीड़ में आएगा शायद

उसे त्योहार की तो याद होगी
यही उम्मीद आँखों में सजी थी
बड़ी तेज़ी से दिल धड़का का था उसका
अभी जब फ़ोन की घंटी बजी थी

कभी तूफ़ाँ की तीखी धार भी हूँ
कभी माँझी,कभी पतवार भी हूँ
मैं पूरब देश की नारी हूँ लेकिन
मैं चुनरी ही नहीं, तलवार भी हूँ

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, October 19, 2008

मुक्तक 6

रोगों के लिए जग में दवा तो होती
सबके लिए अधरों पे दुआ तो होती
अंबार अगर धन का लगा तो क्या है
आँखों में तरस, दिल में दया तो होती

घर शाम पड़े लौटके आना अच्छा
हो सुब्ह तो सोते को जगाना अच्छा
भीतर की विषमता से शिकायत अच्छी
अपनों से मिले दुख को भुलाना अच्छा

सब लक्ष्य हैं, आयाम हैं अपने-अपने
संसार में आराम हैं अपने-अपने
औरों का कोई काम भी करना सीखो
होने को बहुत काम हैं अपने-अपने

यह स्वप्न न देखो कि दुनिया बदले
अच्छा हो कि जीवन का तरीका बदले
भगवान को विपदा के लिए दोष न दो
हम आप जो बदलें तो विधाता बदले

डॉ. मीना अग्रवाल

Saturday, October 18, 2008

मुक्तक 5

जीवन का सरोकार न जाने देना
अच्छे जो हों आसार न जाने देना
इक लम्हे में सदियों के छिपे हैं संकेत
इक लम्हे को भी बेकार न जाने देना

अंधे के लिए दिन का उजाला बेकार
साहस न हो चलने का तो रस्ता बेकार
विश्वास अगर खुद पर नहीं है तुमको
इस हाल में आँखों पर भरोसा बेकार

बिसराई हुई रीत नहीं होना है
बिन गाया हुआ गीत नहीं होना है
संघर्ष जो हालात से करते हैं उन्हें
हालात से भयभीत नहीं होना है

निर्जीव हैं ये रात के सपने जब तक
आकार में इनको नहीं लाते जब तक
विश्वास हो कैसे कि खिले हैं बूटे
महकार हवाओं में न फैले जब तक

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, October 17, 2008

मुक्तक 4

बच्चे के बिना जैसे हो आँगन सूना
आए न घटा फिरके तो सावन सूना
उम्मीद के पंछी से है मन में रौनक
आशा जो नहीं हो तो है जीवन सूना

चुक जाएगी इक रोज़ यह दौलत तेरी
रह जाएगी बाक़ी न ये ताक़त तेरी
भगवान से लेनी है तो हिम्मत ले ले
कुछ साथ अगर होगी तो हिम्मत तेरी

दरियाओं में बहता हुआ ठंडा पानी
चट्टान से मैदान तक आता पानी
स्वभाव में कोमल है मगर काट में तेज
पत्थर को बना देता है सुरमा पानी

डॉ. मीना अग्रवाल

Thursday, October 16, 2008

मुक्तक 3

जीवन का मधुर गीत सुनाती हूँ तुम्हें
सोए हो तो सोते से जगाती हूँ तुम्हें
जो ढूँढने निकलेगा सो पाएगा वही
इक बात पते की यह बताती हूँ तुम्हें

क्यों बात कोई मनकी सुनाने आए
क्यों घाव कोई अप्ने दिखाने आए
क्यों आप ही हम हाल न पूछें उसका
क्यों हमको कोई हाल अपना बताने आए

पत्थर का जरूरी नहीं कोमल होना
दरिया के लिए शुभ नहीं दलदल होना
निर्माण भी बल में है, तो फल भी बल में
दुनिया में महापाप है निर्बल होना

मानव का क्ल्याण मुहब्बत होगी
क्या इससे अधिक कोई राहत होगी
क्या मन से बड़ा है कोई सागर जग में
क्या ज्ञान से बढ़कर कोई दौलत होगी

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, October 15, 2008

मुक्तक 2

उल्लास को आधार न दे तो कहना
बदले में पुरस्कार न दे तो कहना
तुम धूप से पौधे को बचाओ, सींचो
तब फूल यह महकार न दे तो कहना

संकल्प की नाव को वापस नहीं मोड़ा करते
काम कोई हो, अधूरा नहीं छोड़ा करते
दूर हो लक्ष्य तो करते नहीं मन को छोटा
रास्ते में कभी हिम्मत नहीं तोड़ा करते

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, October 12, 2008

मुक्तक 1

पूरी हुई दुनिया की कहानी हमसे
अँगनाइयाँ आबाद हैं घर की हमसे
हम साथ रहेंगी तो उजाला होगा
है रोशनी आधी संसार की हमसे

सूरज की चमकार सिर्फ गनन में कब है
सीमित कोई महकार चमन में कब है
अपनत्व से बन जाती दुनिया अपनी
जो बात प्रेम में है वो धन में कब है
डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, October 1, 2008

मुक्तक 0

हर गीत में पैगाम छिपा होता है
हर कष्ट में आराम छिपा होता है
तुम काम का अंजाम न ढूंढो अपने
हर काम में अंजाम छिपा होता है