Sunday, November 23, 2008

मुक्तक 29

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं
तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं
कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में,
तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं!

हमने सपनों की दुनिया सजाए रखी
शम्अ आँधी में हमने जलाए रखी
सबके सिर से दुपट्टे सरकते रहे
लाज आँचल की हमने बचाए रखी !

डॉ. मीना अग्रवाल

4 comments:

परमजीत बाली said...

bahut sundar muktak haibadhaai

मा पलायनम ! said...

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं
तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं
कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में,
तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं!.....
बहुत खूब क्या कहना .

युग-विमर्श said...

आपके मुक्तकों की ये शब्दावली.
मन को छूती है, सुनने में लगती भली,
भावनाओं को सहलाती है प्यार से,
इसका कोमल सा स्पर्श है मखमली.

संगीता पुरी said...

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं
तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं
कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में,
तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं!

हमने सपनों की दुनिया सजाए रखी
शम्अ आँधी में हमने जलाए रखी
सबके सिर से दुपट्टे सरकते रहे
लाज आँचल की हमने बचाए रखी !

मै आपके ब्‍लाग में इस रचना को नहीं पढ पा रही थी । यहां पर कापी पेस्‍ट किया , तो पढ पा रही हूं। किसी और को भी दिक्‍कत हो सकती है , इसलिए टिप्‍पणी में इसे रहने दिया है। बहुत अच्‍छी रचना है। बधाई।