Monday, December 1, 2008

मुक्तक 30

हमको दुनिया का अंदाज़ भाया नहीं
पथ बदलना कभी हमको आया नहीं
जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं

कहते-सुनते ही नीरस कहानी हुई
धुँधली-धुँधली-सी हर इक निशानी हुई
लाख सोचा सुहागिन ने, समझी नहीं
साल में क्यों ये संगत पुरानी हुई

डॉ. मीना अग्र्वाल

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं
वाह....बहुत अच्छे मुक्तक हैं...आप कमाल का लिखती हैं...बधाई..
नीरज

नव्‍यवेश नवराही said...

आपके मुक्‍तक अच्‍छे हैं

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

हमको दुनिया का अंदाज़ भाया नहीं
पथ बदलना कभी हमको आया नहीं
जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं
अच्‍छे मुक्‍तक हैं बधाई..

Shambhu Choudhary said...

जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं
आप अपना पूरा परिचय मुझे भेजती तो मुझे आपको प्रकाशित कर के अच्छा लगता।
शम्भु चौधरी

सुलभ सतरंगी said...

बेहतरीन मुक्‍तक !