Tuesday, November 11, 2008

मुक्तक 26

हमको अपने बराबर न तोला कभी
यह पुराना तरीक़ा न बदला कभी
दिल की धड़कन से गीतों की धुन फूटती
पति शासक नहीं, मित्र बनता कभी

अपने भेदों की गुत्थी न खोलोगे तुम
बस अँधेरे में रस्ता टटोलोगे तुम
घर में फिर लौटकर देर से आओगे
जानती हूँ कि फिर झूठ बोलेगे तुम

डॉ. मीना अग्रवाल

3 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा।

mehek said...

bahut khub

Udan Tashtari said...

अच्छे मुक्तक!!