Thursday, June 17, 2010

मुक्तक 39

यदि हम सच्चे मन से देखें तो बहू और बेटी में कोई
अंतर नहीं है.जो बेटी है वह दूसरे घर की बहू है और
जो बहू है वह अपनी माँ की बेटी भी है. यदि हम इस
सत्य को जान लें तो बहू-बेटी के बीच का अंतर ही मिट
जाएगा.जो बहू-बेटी में अंतर नहीं करते हैं और बहू को
बेटी समझते हैं वे कभी दुखी नहीं रहते.उनका मानना
यही है---

यहाँ माँ अपनी बेटी को,तो सासें अपनी बहुओं को
जो पुश्तों से सुरक्षित था,वो ज़ेवर सौंप जाती हैं
विरासत में जिसे ज़ेवर कहें वह तो बहाना है
जो सच पूछो तो ममता की धरोहर सौंप जाती है.

डॉ.मीना अग्रवाल

4 comments:

श्यामल सुमन said...

बहुत बहुत ही सार्थक भाव की पंक्तियाँ। वाह।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बेहतरीन लगे मुक्तक!

Monika said...

वाह बहुत बहुत खूब आपने तो चन्द पंक्तियो मे इतनी गहरी बात कह डाली जो शायद बहुत कुछ कहे जाने पर भी कम हो. सास बहू का रिश्ता इतना नाज़ुक होता हे की ज़रा सी लापरवाही इसे झकझोर देती हे. इस तरह की विचारधारा इस रिश्ते को नया नाम दे सकती थी. आपको बहुत बहुत धन्यवाद देती हू और बधाई भी.

Ashutosh Dubey said...

बहुत अच्छी पोस्ट !
हिंदीकुंज