Wednesday, March 3, 2010

मुक्तक 35

समय के हाथ में जीवन का आसरा हम हैं
कला की जान हैं, कविता की आत्मा हम हैं
इक एक रूप के पीछे हमारे रूप अनेक
परी हैं, देवी हैं, नारी हैं, अप्सरा हम हैं !

किसी को हाल जो भीतर का है पता न चले
किसी को दर्द के एहसास की हवा न लगे
दुखों को सहने का ढब जानती हैं बालाएँ
उदास होके भी चेहरा उदास-सा न लगे !

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, February 26, 2010

मुक्तक ३४

दया पे जीना किसी की मुझे गवारा नहीं
मैं अपने आपमें पर्वत हूँ, जल की धारा नहीं
अकेली होके भी दुर्बल नहीं रही हूँ मैं
तुम्हारा साथ मुझे चाहिए, सहारा नहीं !

अलकों से अगर छाए अँधेरे तो क्या
नयनों से जो फूटे सवेरे तो क्या
संसार को कुछ प्रेम का रंग भी तो दे दें
चुनरी ने अगर रंग बिखेरे तो क्या !

होली की अनंत शुभ कामनाओं के साथ--


डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, February 12, 2010

मुक्तक 33

वह अपनी आँखों में उमड़ी घटाएँ भेजती है
वह अपने प्यार की ठंडी हवाएँ भेजती है
कभी तो ध्यान के हाथों,कभी पवन के साथ
वह माँ है, बेटे को शुभकामनाएँ भेजती है ।

वे भोली-भाली-सी शक्लें भी साथ रहती हैं
सुनी सुनाई-सी बातें भी साथ रहती हैं
अकेले आए थे परदेस में, मगर यह क्या ?
गली- मुहल्ले की यादें भी साथ रहती हैं .

Wednesday, January 21, 2009

मुक्तक 32

तपन बढ़ी है तो तन-मन जला है अब के बरस
शरद की रुत में भी सूरज तपा है अब के बरस
चला गया है जो अश्कों को पोंछने वाला
हमारी आँखों में सूखा पड़ा है अब के बरस

वह अब तो शाम को घर लौटकर नहीं आता
उसे मिली भी जो मंज़िल तो इतनी दूर मिली
सुना है पार समुंदर, पराए देश में है
जो उसने नौकरी ढूँढी तो कितनी दूर मिली

डॉ. मीना अग्रवाल

Thursday, January 8, 2009

नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष की अनंत शुभकामनाएँ--

नए वर्ष की नई दिशा हो
नई कामना, नई आस हो
नई भावना, नई सोच हो
नई सुबह की नई प्यास हो
नई धूप हो, नई चाँदनी
नई सदी का नव विकास हो
नया प्रेम औ' नया राग हो
हर सुख अपने आसपास हो
नई रौशनी, नई डगर हो
नया खून औ' नई श्वास हो
नया रूप औ' नव जुनून हो
मन में बसती नव मिठास हो
नए सपन हों, नई शाम हो
रंग-बिरंगा कैनवास हो
नए फूल औ' नई उमंगें
अंतर्मन में नव सुवास हो !

डॉ. मीना अग्रवाल

Tuesday, December 9, 2008

मुक्तक 31

अजीब बात है पहले पहल की चाहत में
तुम्हारे झूठ भी सच की तरह-से लगते थे
मैं अब अकेले में यह सोच-सोच हँसती हूँ
तुम्हारे पास लुभाने को कितने सपने थे

मेरे ध्यान के एलबम में चित्र हैं तेरे
बुझी नहीं है तेरी दीपिका जलाई हुई
नयन से दूर है, मन के करीब लगती है
पराई होके भी बेटी कहाँ पराई हुई

डॉ. मीना अग्रवाल

Monday, December 1, 2008

मुक्तक 30

हमको दुनिया का अंदाज़ भाया नहीं
पथ बदलना कभी हमको आया नहीं
जब शपथ लेके हमने किसी हाथ में
अपना आँचल दिया तो छुड़ाया नहीं

कहते-सुनते ही नीरस कहानी हुई
धुँधली-धुँधली-सी हर इक निशानी हुई
लाख सोचा सुहागिन ने, समझी नहीं
साल में क्यों ये संगत पुरानी हुई

डॉ. मीना अग्र्वाल