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Friday, March 12, 2010

मुक्तक 36

ये खेत हमने दिए, क्यारियाँ हमीं ने दीं
ज़मीं की गोद को फुलवारियाँ हमीं ने दीं
उदास-उदास-सी चुप से भरा हुआ था घर
तुम्हारे सुनने को किलकारियाँ हमीं ने दीं !

विरह का तीर तुम्हारी कमान छोड़ गई
बिलखती-चीख़ती विरहन की जान छोड़ गई
ज़रा-सा ध्यान जो भटका तो मौलकर चूड़ी
कलाइयों में लहू का निशान छोड़ गई

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, January 21, 2009

मुक्तक 32

तपन बढ़ी है तो तन-मन जला है अब के बरस
शरद की रुत में भी सूरज तपा है अब के बरस
चला गया है जो अश्कों को पोंछने वाला
हमारी आँखों में सूखा पड़ा है अब के बरस

वह अब तो शाम को घर लौटकर नहीं आता
उसे मिली भी जो मंज़िल तो इतनी दूर मिली
सुना है पार समुंदर, पराए देश में है
जो उसने नौकरी ढूँढी तो कितनी दूर मिली

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, November 23, 2008

मुक्तक 29

अपनी पीड़ा कहें, यह चलन भी नहीं
तुमसे मिलने का कोई जतन भी नहीं
कैसी अलसाई बैठी हूँ अँगनाई में,
तुम नहीं तो सँवरने का मन भी नहीं!

हमने सपनों की दुनिया सजाए रखी
शम्अ आँधी में हमने जलाए रखी
सबके सिर से दुपट्टे सरकते रहे
लाज आँचल की हमने बचाए रखी !

डॉ. मीना अग्रवाल