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Monday, November 10, 2008

मुक्तक 25

जाने नदिया यह सपनों की जम क्यों गई
जाने मुसकान होठों पे थम क्यों गई
जन्म बेटी का होना अशुभ क्यों हुआ
किससे पूछूँ कि माता सहम क्यों गई !

ध्यान में है वो नादान लड़की अभी
झूठे वादे जो मन से लगाए रही
लौटकर फिर कभी जिसको आना न था
उसके स्वागत में पलकें बिछाए रही !

डॉ. मीना अग्रवाल

Friday, November 7, 2008

मुक्तक 23

हम डगर अपनी छोडें, यह संभव नहीं
आत्मा अपनी बदलें, यह संभव नहीं
फ़ैशनों की नुमाइश में रहते हुए
मूल से अपने बिछुड़ें यह संभव नहीं

मेरे सपनों का आदर्श मानव है
सोच यह मेरी बदले असंभव है
मेरी पहचान दुनिया में सबसे अलग
मैं हूँ भारत की नारी , मुझे गर्व है

ताज़ा फूलों के अंबार भेजूँ तुम्हें
बस अगर हो तो सौ बार भेजूँ तुम्हें
नित नई ख़ुशबुओं को जो आकार दे
सुर्ख मेंहदी की महकार भेजूँ तुम्हें

आदमी से बड़ा धन न बन पाएगा
सोचते थे समय तो बदल जाएगा
हम रहेंगे सफ़र में सदा साथ-साथ
प्यार बाँटेंगे, अपनत्व भी आएगा !

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, November 5, 2008

पहचान

अंदर-अंदर टूटन
अंतर में घुटन
और मुख पर मुस्कान
खुशियाँ लुटाना
आदत-सी बन गई है उसकी
इसी आशा में
इसी प्रत्याशा में
कि शायद
वो एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा
जो नारी को
उसके अस्तित्व की
पहचान कराएगा
आदर दिलाएगा
उसके अंतर की पीड़ा से
तिलमिलाएगा समाज
और तथाकथित समाज के
योग्य और सहृदय जन
महसूस करेंगे
उसकी छटपटाहट को
देंगे नारी को
उसकी पहचान
देंगे उसे सम्मान
और जीने का अधिकार
क्योंकि नारी
टूटकर भी
सदैव रही है संपूर्ण
पक्का भरोसा है उसे कि
एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा
जब खोया हुआ अतीत
होगा उजागर
इंतज़ार है उसे
उस दिन का
जो उसे न्याय दिलाएगा
देखते हैं कब आएगा
वह भाग्यशाली एक दिन !

डॉ. मीना अग्रवाल